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मनीष कुमार/डेहरी/रोहतास:
डेहरी प्रखंड के अंतर्गत दरीहट में राजमाता अहिल्याबाई होलकर की 301वीं जयंती समारोह बड़े ही श्रद्धा, उत्साह और भव्यता के साथ आयोजित किया गया। इस अवसर पर राजमाता अहिल्याबाई होलकर एवं बाबा सूरदास की प्रतिमा का अनावरण कर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में पाल समाज के लोगों सहित विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
समारोह का उद्घाटन सुरसंड विधानसभा (सीतामढ़ी) के विधायक प्रो. नागेंद्र रावत पाल ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सुरेंद्र पाल ने की। समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में चंद्र मोहन पाल (अध्यक्ष, बिहार राज्य पाल महासंघ), विनय पाल (जिला पार्षद, कोचस पश्चिमी, रोहतास), अमरेंद्र पाल (वरिष्ठ राजनेता, डेहरी ऑन सोन), राजेश पाल (जदयू नेता, पटना), अनिल पाल (पाल समाज अध्यक्ष), ईश्वरीय रामचंद्र प्रसाद सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे।
मंच की अध्यक्षता राजदेव पाल ने की, जबकि मंच संचालन विजेंद्र पाल (अधिवक्ता, डेहरी) ने किया। कार्यक्रम में अजय पाल (पंचायत समिति सदस्य), कर्मेंद्र पाल (पंचायत समिति सदस्य, इंदौर रोहतास), रामविलास पाल (मुखिया प्रतिनिधि), श्रीमती किरण देवी, मोतीलाल पाल, शशि पाल समेत अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं ग्रामीणों ने भाग लिया।
अपने संबोधन में वक्ताओं ने राजमाता अहिल्याबाई होलकर के जीवन, उनके आदर्शों और समाज सेवा के कार्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने अपने शासनकाल में न्याय, धर्म, शिक्षा और जनकल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। वक्ताओं ने समाज के युवाओं से उनके आदर्शों को अपनाने और समाजहित में कार्य करने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान सांस्कृतिक प्रस्तुतियां भी आयोजित की गईं। उपस्थित लोगों ने राजमाता अहिल्याबाई होलकर और बाबा सूरदास की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित कर नमन किया। पूरे आयोजन में सामाजिक एकता, सांस्कृतिक गौरव और समाज के उत्थान का संदेश दिया गया।
राजमाता अहिल्याबाई होलकर का जन्म 31 मई 1725 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के चौंडी गांव में हुआ था। वे मराठा साम्राज्य की प्रसिद्ध और आदर्श शासक थीं। पति खंडेराव होलकर तथा ससुर मल्हारराव होलकर के निधन के बाद उन्होंने मालवा राज्य की बागडोर संभाली।
अहिल्याबाई अपने न्यायप्रिय शासन, जनकल्याणकारी कार्यों और धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्होंने देशभर के अनेक मंदिरों, घाटों और धर्मशालाओं का निर्माण कराया। वाराणसी के काशी विश्वनाथ मंदिर, सोमनाथ मंदिर सहित कई प्रमुख धार्मिक स्थलों के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
उनका शासनकाल शांति, समृद्धि और सुशासन का प्रतीक माना जाता है। आज भी उन्हें भारतीय इतिहास की महानतम महिला शासकों में गिना जाता है। उनकी जयंती समाज सेवा, महिला सशक्तिकरण और जनकल्याण के प्रति समर्पण की प्रेरणा देती है।

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