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सासाराम- रोहिणी नक्षत्र में शुरू करें धान की नर्सरी, बेहतर होगी पैदावार : डॉ. धनंजय तिवारीl


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हरिनाथ चौधरी/सासाराम/रोहतास:

गोपाल नारायण सिंह विश्वविद्यालय, जमुहार, सासाराम के अंतर्गत संचालित नारायण कृषि विज्ञान संस्थान के शस्य विज्ञान विभाग में कार्यरत सहायक प्राध्यापक सह प्रभारी फसल प्रक्षेत्र डॉ. धनंजय तिवारी ने किसानों को सलाह देते हुए कहा है कि रोहिणी नक्षत्र धान की नर्सरी (बिचड़ा) तैयार करने के लिए सबसे उपयुक्त समय माना जाता है। इस अवधि में तैयार की गई नर्सरी से स्वस्थ एवं मजबूत पौध प्राप्त होती है, जिससे धान की फसल की बढ़वार और उत्पादन दोनों में वृद्धि होती है।

डॉ. तिवारी ने बताया कि खरीफ मौसम में विशेषकर लंबी अवधि वाली धान की प्रजातियों की बुआई एवं नर्सरी तैयार करने के लिए रोहिणी नक्षत्र अत्यंत अनुकूल माना जाता है। इस समय वातावरण में गर्मी और नमी का संतुलन बनने लगता है, जो धान के बीजों के अंकुरण और पौधों की प्रारंभिक वृद्धि के लिए उपयुक्त परिस्थितियां प्रदान करता है। प्री-मानसून वर्षा की शुरुआत होने से खेतों में पर्याप्त आर्द्रता बनी रहती है, जिससे बीज तेजी और समान रूप से अंकुरित होते हैं।

उन्होंने कहा कि रोहिणी नक्षत्र में तैयार की गई नर्सरी में पौधों की जड़ें अच्छी तरह विकसित होती हैं। बाद में मुख्य खेत में रोपाई करने पर पौधे तेजी से स्थापित होते हैं और उनकी बढ़वार बेहतर होती है। समय पर नर्सरी तैयार होने से किसानों को मानसून की पहली अच्छी वर्षा के साथ रोपाई करने का अवसर मिलता है, जिससे फसल को विकसित होने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है और उत्पादन बढ़ने की संभावना रहती है।

कृषि वैज्ञानिक ने किसानों को सलाह दी कि नर्सरी के लिए ऊंची एवं समतल भूमि का चयन करें, जहां जल निकासी की समुचित व्यवस्था हो। खेत की अच्छी तरह जुताई करने के बाद उसमें सड़ी हुई गोबर की खाद मिलानी चाहिए। साथ ही उन्नत एवं प्रमाणित बीजों का ही उपयोग करना चाहिए।

बीज की मात्रा के संबंध में उन्होंने बताया कि एक बीघा क्षेत्र में रोपाई के लिए 2.5 से 3 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। यदि बीज का अंकुरण प्रतिशत कम हो तो किसान 4 से 4.5 किलोग्राम बीज प्रति बीघा की दर से नर्सरी में उपयोग कर सकते हैं।

उन्होंने बीज उपचार की जानकारी देते हुए कहा कि बुवाई से पहले बीजों को 1 लीटर पानी में 10 से 20 ग्राम नमक मिलाकर तैयार घोल में भिगोना चाहिए। इससे हल्के और खराब बीज अलग हो जाते हैं। इसके बाद बीजों को साफ पानी से धोकर जूट की बोरी से 15 से 20 घंटे तक ढककर रखना चाहिए। अंकुरण शुरू होने के बाद ही बीजों की बुवाई करनी चाहिए।

डॉ. तिवारी ने बताया कि बुवाई के समय खेत की सतह पर पर्याप्त नमी या हल्का पानी होना आवश्यक है। तापमान अधिक होने के कारण नर्सरी में लगातार नमी बनाए रखना भी जरूरी है, ताकि पौधों का विकास बेहतर ढंग से हो सके।

उन्होंने किसानों को अपने क्षेत्र की जलवायु और भूमि के अनुसार उन्नत धान प्रजातियों का चयन करने की सलाह दी। सुगंधित धान की किस्मों में राजेंद्र भगवती, राजेंद्र कस्तूरी और राजेंद्र सुवासिनी उपयुक्त हैं। निचली भूमि के लिए सबौर हीरा, स्वर्ण सब-1 और राजेंद्र महसूरी की खेती लाभदायक मानी जाती है। वहीं सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए सबौर हर्षित धान, राजेंद्र श्वेता, सबौर सम्पन्न और सबौर श्री बेहतर विकल्प हैं। अधिक उत्पादन के लिए किसानों को स्वर्णा (एमटीयू-7029) तथा बीपीटी-5204 जैसी उन्नत किस्मों का उपयोग करने की सलाह दी गई है।

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