(शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक एकता पर जोर; वनोपज की खरीद-बिक्री पर लगी पाबंदियां हटाने की मांग)
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संवदाता- मुकेश कुमार मिश्रा/नौहट्टा/रोहतास:
कैमूर पहाड़ी के शीर्ष पर स्थित बरकट्ठा गांव में रविवार को आदिवासी समाज के लोगों ने एकजुट होकर विश्व आदिवासी दिवस मनाया। कार्यक्रम के दौरान आदिवासी समाज की वर्तमान स्थिति, शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक अधिकार तथा जल-जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दों पर विस्तार से चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी भाषा, संस्कृति, परंपरा और प्रकृति से गहरे रूप से जुड़ी हुई है। ऐसे में जल, जंगल और जमीन की रक्षा के साथ-साथ नई पीढ़ी को शिक्षा और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्व सरपंच लक्ष्मण उरांव ने की, जबकि मंच संचालन सुदामा उरांव ने किया। कार्यक्रम की शुरुआत आदिवासी समाज के महापुरुषों और पूर्वजों बिरसा मुंडा, सिद्धू-कानू, वीर बुद्धू भगत, नीलांबर-पीतांबर, कांट्या भील, शिबू सोरेन एवं हरि प्रसाद घमड़ी सिंह खैरवार के तैलचित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलित कर की गई। इस दौरान उपस्थित लोगों ने आदिवासी समाज के संघर्ष, बलिदान और विरासत को याद करते हुए उनके बताए रास्ते पर चलने का संकल्प लिया।
शिक्षा को बताया समाज के विकास की कुंजी
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि आदिवासी समाज में शिक्षा के प्रति जागरूकता लगातार बढ़ रही है और नई पीढ़ी के बच्चे स्कूलों से जुड़ रहे हैं। हालांकि, पहाड़ी और वन क्षेत्रों में रहने वाले बड़ी संख्या में परिवार आज भी अपनी आजीविका के लिए जंगल पर निर्भर हैं। ऐसे परिवारों के बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने के साथ उन्हें अपने संवैधानिक एवं सामाजिक अधिकारों की जानकारी देना जरूरी है।
वक्ताओं ने कहा कि शिक्षा केवल रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, संस्कृति और समाज को समझने का महत्वपूर्ण साधन भी है। इसलिए अभिभावकों से बच्चों को नियमित रूप से शिक्षा से जोड़ने और उन्हें आगे बढ़ाने की अपील की गई।
वनोपज की खरीद-बिक्री में पाबंदियों का मुद्दा उठा
कार्यक्रम के दौरान जंगल से मिलने वाली उपज को लेकर आदिवासी परिवारों की समस्याओं पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि जंगल में रहने और वर्षों से वन संसाधनों पर निर्भर रहने के बावजूद आदिवासी परिवारों को कई प्रकार की वनोपज के उपयोग और उसकी खरीद-बिक्री में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने महुआ, पीआर सहित अन्य वनोपज की खरीद-बिक्री की अनुमति देने की मांग उठाई। वक्ताओं का कहना था कि वनोपज आदिवासी परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार है। यदि उन्हें अपनी मेहनत से प्राप्त वन उपज का उचित मूल्य और बाजार उपलब्ध हो, तो उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सकता है।
उन्होंने कहा कि आदिवासियों के लिए जंगल और पहाड़ केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं हैं, बल्कि उनकी जीवनशैली, परंपरा, संस्कृति और पहचान का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए जंगलों के संरक्षण के साथ वहां रहने वाले समुदायों के हितों और आजीविका को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
जल-जंगल-जमीन को बताया पूर्वजों की धरोहर
अधौरा के जिला पार्षद सदस्य राजू सिंह खैरवार ने कहा कि विश्व आदिवासी दिवस समाज के लिए आत्ममंथन और एकजुटता का अवसर है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को अपनी एकता को और मजबूत करने की जरूरत है। अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा और पहचान को बचाए रखना प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन आदिवासी समाज की पहचान और उनके पूर्वजों की धरोहर है। आने वाली पीढ़ी के लिए प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखना जरूरी है। उन्होंने समाज के लोगों से आपसी एकता बनाए रखने और बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का आह्वान किया।
जातीय वर्गीकरण की विसंगति का मुद्दा उठाया
पटना से कार्यक्रम में पहुंचे ललित भगत ने आदिवासी समाज से जुड़े जातीय वर्गीकरण में कथित विसंगतियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि एक ही जाति के लोगों को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया है।
उन्होंने विशेष रूप से खैरवार जाति का उल्लेख करते हुए कहा कि कहीं इसे अनुसूचित जाति तो कहीं अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किया गया है। उन्होंने इसे गंभीर विसंगति बताते हुए इसके समाधान की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों पर समाज को संगठित होकर अपनी बात मजबूती से रखने की जरूरत है।
बड़ी संख्या में शामिल हुए आदिवासी समाज के लोग
कार्यक्रम में झारखंड से विश्वनाथ तिर्की, पटना से ललित भगत, अधौरा जिला पार्षद सदस्य राजू सिंह खैरवार, पूर्व सरपंच लक्ष्मण उरांव, पवन सिंह, नंदन सिंह, दुलार खैरवार, दुलार उरांव, अशोक उरांव दुग्धा, मुनि उरांव, सुरेश खैरवार, धर्मेंद्र सिंह खैरवार सहित बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग मौजूद रहे।
कार्यक्रम के दौरान समाज के लोगों ने अपनी संस्कृति और परंपराओं को संरक्षित रखने, बच्चों को शिक्षित करने, जल-जंगल-जमीन की रक्षा करने तथा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने पर जोर दिया। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर बरकट्ठा में आयोजित यह कार्यक्रम आदिवासी समाज की एकता, अधिकारों और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने का संदेश देता नजर आया।

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